ALEXANDER THE GREAT(SIKANDAR), HISTORY, BIOGRAPHY IN HINDI

ALEXANDER THE GREAT(SIKANDAR), HISTORY, BIOGRAPHY IN HINDI

 

सिकंदर(sikandar), एलेग्जेंडर थे ग्रेट (alexander the great) का जन्म 20 जुलाई 356 ईसा पूर्व पहला मेसेडोनिया शहर में हुआ था जो यूनान देश में स्थित था। वह अपनी महानतम हस्ती और महान कार्यों के लिए जाना जाता है कहते हैं कि उसने संपूर्ण भूमि का एक बहुत बड़ा हिस्सा जीत लिया था। जिसके बारे में यूनान के कई लोगों को पता तक नहीं था इसलिए उसे एक महान राजा की श्रेणी में रखा गया है। और एक महान राजा मारने के साथ साथ ही उसके नाम के आगे सिकंदर महान लगाया जाता है जिसे इंग्लिश में एलेग्जेंडर द ग्रेट(alexander the great) के नाम से भी पुकारा जाता है। लेकिन आज हम ऐसे तथ्य के बारे में बात करेंगे जो यह साबित कर देगा कि ना तो एलेग्जेंडर यानी कि सिकंदर एक महान योद्धा था। बल्कि यह भी साबित कर देगा कि जो इन्हीं पश्चिमी देशों ने इतिहास लिखा है जिसे हम लोग आंख मूंदकर मान लेते हैं वह एक गलत इतिहास है।

 

दरअसल भारत में सिकंदर(sikandar) को बैटल ऑफ़ हाइडेस्पेस यानी कि हिडेस्पेस की युद्ध के लिए जाना जाता है। इस युद्ध में राजा सिकंदर की लड़ाई नाम के एक भारतीय राजा से हुई थी। जिसमें पश्चिमी देशों के अनुसार सिकंदर महान ने राजा पुरु को हरा दिया था और राजा पुरुँ की वीरता को देखते हुए उसने उसके राज्य को वापस लौटा दिया था। इस जुमले को हम आज गलत साबित कर देंगे और यह भी बता देंगे कि पूर्ण ए राजा सिकंदर को ना सिर्फ हराया था बल्कि खदेड़ खदेड़ के भारत के बाहर भी निकाल दिया था।

जो लोग सिकंदर को महान कहते हैं और इस वाक्य में विश्वास रखते हैं। जो कि कहा जाता है कि जो जीता वही सिकंदर आज हम इसको गलत साबित कर देंगे और बता देंगे कि सिकंदर ना तो महान था बल्कि बल्कि वो हिडेस्पेस का युद्ध भी नहीं जीता था बल्कि बुरी तरह हारा था। और हमारे देश के अन्य जात्रा जाने से दौड़ा दौड़ा कर इतना पीटा था कि आगे चलकर उसकी मृत्यु हो गई थी और उसकी जीवन लीला महज 32 साल की उम्र में ही समाप्त हो चुकी थी।

 

तो चलिए दोस्तों हम शुरू करते हैं सिकंदर की यह एक कहानी और बताते हैं आप सभी को असल में असलियत क्या थी और उस युद्ध में क्या हुआ था जिसमें सिकंदर राजा पुरू से लड़ा था और हारा था।

 

सिकंदर(sikandar) का शुरुआती जीवन 

 

सिकंदर का जन्म 30 जुलाई 356 ईसा पूर्व मेसेडोनिया शहर में हुआ था जो यूनान देश में स्थित है। सिकंदर(sikandar) के पिता का नाम फिलिप द्वितीय था और उनकी माता का नाम ओलंपियाज था। जैसा कि अन्य राजाओं के पुत्र अपने बचपन काल में ही करते हैं वह भी वैसा ही कर रहा था और युद्ध विद्या में निपुण होने की कोशिश कर रहा था। जो कि वह सफल रहा है वह यादों में सबसे महत्वपूर्ण और ताकतवर योद्धा के रूप में अपनी जवानी में उभरा उसके गुरु ने उसे सारी युद्ध विद्या में निपुण कर दिया था। वह अपनी तलवारबाजी और तीर धनुष युद्ध कलाओं में बिल्कुल निपुण हो चुका था। सिकंदर यवनों  में सबसे ज्यादा प्रसिद्ध होने वाला योद्धा साबित हुआ था।

 

वह बहुत छोटा था उसी समय उसने निर्णय लिया था कि वह सारी दुनिया को जीत लेगा और इसके लिए वह बहुत कड़ी मेहनत करेगा। और कई युद्ध करेगा लेकिन वह किसी पर कोई भी रहम  नहीं करेगा क्योंकि रहम करेगा तो वह कभी भी एक विश्व विजेता नहीं बन सकता यह बात अच्छी तरीके से जानता था। जब वह बड़ा हुआ तब उसकी बहुत छोटी सी उम्र में ही उसके पिताजी का देहांत हो गया। जिसके उपरांत उसे उस राज्य का राजा घोषित कर दिया गया तब उसे लगा कि अब यह वक्त आ चुका है कि अब मैं अब सारी दुनिया को जीत लूँ।  इसलिए वह विश्व विजेता बनने के लिए अपनी यात्रा पर निकल गया और बहुत ही अच्छी सेना को साथ ले लिया।

 

जब सिकंदर(sikandar)  अपने गुरु के बेटे और अपने भाइयों का क़त्ल कर दिया 

sikandar

 

सिकंदर(sikandar) के इतिहास पर की ईरानियों ने और चीनियों ने अलग किताब लिखी है जो दर्शाती है कि वह बिल्कुल भी एक महान शासक नहीं था बल्कि एक क्रूर और निर्दई यूनानी राजा था।  जो सिर्फ और सिर्फ अपने विश्व विजय होने की भूख के चलते हर किसी को नरसंहार की दृष्टि से देखता जा रहा था और न जाने कितनी ही गर्दनों  को उनके धड़ से अलग करता हुआ आगे बढ़ रहा था।

 

सिकंदर(sikandar) का एक वाक्य बहुत ही मशहूर है कि जब उसका गुरु उसे युद्ध विद्या में निपुण कर रहा था तो वह बहुत ही अच्छी शिक्षा को ग्रहण कर रहा था और सब कुछ बहुत ही अच्छी तरीके से सीख रहा था। उसकी नजर में यह बात बिल्कुल साफ़ थी कि उसे आगे चलकर एक विश्व विजेता बनना है। तभी उसके सामने उसके गुरु का एक भतीजा एक अच्छी तरह से युद्ध विद्या को सीख रहा था और एक कुशल योद्धा के रूप में उभर रहा था। यह देख सिकंदर को लगा कि यह लड़का मेरे विश्व विजेता बनने के रास्ते में रोड़ा साबित हो सकता है तभी उसने उस लड़के के मृत्यु के लिए षड्यंत्र रचना शुरू कर दिया और युद्ध अभ्यास के समय ही उस लड़के को जान से मार दिया। यह देख उसके गुरु ने कहा यह तुमने क्या किया? मैंने तुम्हें इतनी युद्ध विद्या सिखाई इतना निपुण बनाया पर तुमने मेरे सगे भतीजे का ही कत्ल कर दिया। इस वाक्य के जवाब में सिकंदर ने अपने गुरु को उत्तर दिया कि वह एक विश्व विजेता बनना चाहता है और यह लड़का उसे विश्व विजेता बनने की राह में एक रोड़ा दिखाई दे रहा था। इसलिए उसने इसे जान से मार दिया मुझे विश्व विजेता बनने से कोई भी नहीं रोक सकता।

 

सिकंदर(sikandar) ने यूनान के राज्य को पाने के लिए न जाने अपने कितने ही सगे व सौतेले भाइयों का कत्ल कर दिया था। ताकि वह राजा बन सके ऐसा क्रूर राजा कभी किसी पर दया नहीं दिखा सकता जो लोग और इतिहासकार यह कहते हैं उसने राजा पुरू को दया करके छोड़ दिया था। तो ऐसा तो बिल्कुल संभव ही नहीं है ऐसा निर्दई और क्रूर राजा किसी अन्य राजा को उसका राज्य जीतने के बाद वापस कर दे और कह दे कि मैंने दया करके राज्य वापस कर दिया है।

 

दरअसल पश्चिमी देशों ने सिकंदर के इतिहास को कितना तोड़ मरोड़ के महान बनाने की कोशिश की है कि उस पर विश्वास करना बिल्कुल नामुमकिन सा लगता है। उन्होंने अपने राजा को दुनिया का सबसे महान बनाने के लिए यह मनगढ़ंत इतिहास लिख दिया है। और कुछ इतिहास का श्रेय सिकंदर को भी जाता है दरअसल सिकंदर अपने साथ कुछ लोग केवल उसका इतिहास लिखने के लिए ही रखा करता था। तो भी लोग उसके इतिहास में से उसकी कमियों को छुपा कर उसकी पढ़ाई को लिखते थे ताकि सभी लोग इतिहास में उसको महान समझें और राजा भी उनसे खुश रहे। इसीलिए बड़ी चालाकी से उन्होंने उसे राजा पुरु से हुए युद्ध में न सिर्फ पुरु कोहारा हुआ बताया बल्कि यह बता दिया कि वे उनके राजा सिकंदर महान ने दया करके पूर्व को उनका राज्य लौटा दिया था। और संधि के रूप में उनसे यह वादा लिया था कि वे आगे चलकर जितनी भी सिकंदर लड़ेगा उनकी सहायता करेंगे। अगर हम इतिहास की टिप्पणी को सच मान लें तो फिर सिकंदर  भारत के मगध को क्यों नहीं जीत पाया।

 

सिकंदर(sikandar) का भारत पर आक्रमण 

 

जब बात दुनिया को जीतने की हो तो सिकंदर भारत को कैसे छोड़ सकता था। आखिरकार भारत उस समय सोने की चिड़िया कहा जाता था जहां पर सोना गलियों में भी मिल जाया करता था। तो यह लुटेरा सिकंदर भारत में घुस आया और वहां के छोटे-छोटे राज्यों को जीतने लगा दरअसल इसकी तकनीकी रहती थी कि पहले यह राजाओं को संदेश भेज वादा था कि या तो मेरी आधीनता स्वीकार कर ले या फिर मुझसे युद्ध के लिए तैयार हो जाए। और चब राजा युद्ध के लिए तैयार हो जाते थे तो यह घबरा जाता था और संधि का प्रस्ताव आगे के लिए भेज दिया करता था। इसी के चलते हिंदू राजा इसकी चाल में फंस जाया करते थे और संधि के लिए जैसे ही जाते थे तो यह उसके राजा को या तो बंदी बना लिया करता था या वहीं पर मार दिया करता था। जिसके चलते अन्य से ना सका जाती थी और सिकंदर की सेना उन पर भारी पड़ जाया करती थी और मार दिया करती थी और इसी तरह व राज्य को जीत जाता था।

 

जब तक हिंदू राजा इसकी यह चाल समझ पाते थे तब तक यह बहुत राज्यों को अपने अधीन कर चुका था। इसी के चलते कई ऐसे राज्य भी थे जहां पर स्त्रियों का शासन था तो स्त्रियों के शासन में यह वहां गया। और कहा कि मैं संधि करना चाहता हूं और स्त्रियों का सम्मान सहित उनका आदर भी करना चाहता हूं तो वहां की स्त्रियां इससे संधि के लिए तैयार हो गई। और इसे एक बहुत बड़ा और शानदार हीरो से जड़ा हुआ मुकुट भेंट किया गया जिसे देखकर सिकंदर की आंखें चौड़ी हो गई और इसे यकीन हो गया है कि भारत में बहुत साधन है। और सिकंदर ने निश्चय कर लिया कि मैं भारत को जीत कर ही यहां से लौटूंगा। तब इसने अपनी चाल को चलते हुए वहां की सारी औरतों और बच्चों के साथ उनके धड़ से अलग कर दिए और वहां के राज्य का मालिक हो गया।

 

अब आगे इसका पाला एक ऐसे राजा से पढ़ना था जो ना केवल अपनी वीरता के लिए बल्कि एक बहुत बड़ी सेना के लिए भी जाना जाता था। तरह सिकंदर को बिल्कुल भी अंदाजा नहीं था कि राजापुर की सेना इतनी बड़ी है कि उसके आगे सिकंदर बिल्कुल भी नहीं टिक पाएगा। और अपने विश्व विजेता बनने की चाह  मैं अपने सैनिकों को लेकर सिंध  नदी की तरफ बढ़ चला जहां पर उसका सामना राजापुर उसे होना था और सारा इतिहास बदलने वाला था।

 

सिकंदर और पुरु का युद्ध 

 

वह धीरे धीरे भारत के छोटे छोटे राज्यों को जीतता हुआ जा रहा था। उसे कोई हरा नहीं पा रहा था इसी वजह से कई राज्यों ने तो उसके आगे समर्पण करके उसका अधिपत्य स्वीकार भी कर लिया था। और उसने उन राज्यों की सेनाओं को भी अपने साथ शामिल करते हुए आगे बढ़ने का फैसला भी किया था। वह अपनी जीत की गरज की हुंकार भरते हुए सिंध की और झेलम नदी के पास पहुँचा।

वहां पहुँच कर उसने वहां के राजा को सन्देश भिजवाया की  या तो वह सिकंदर का अधिपत्य स्वीकार कर लें और राज्य को सिकंदर(sikandar) के प्रति समर्पित कर दें। वहां के राजा पुरु थे उन्होंने इस बात का उत्तर देते हुए कहा की राज्य बातों से नहीं युद्ध से जीते जाते हैं। इसी के साथ सिकंदर ने युद्ध का एलान कर दिया और इस युद्ध के एलान को राजा पुरु ने स्वीकार कर लिया। इस युद्ध का स्थान झेलम नदी के पास तय किया गया और आज यही युद्ध बैटल ऑफ़ हैडस्पेस(battle of hydaspes) के नाम से पुरे संसार जाना जाता है।

 

युद्ध स्थान पर सिकंदर और पुरू की सेना 

sikandar

 

हैडस्पेस का युद्ध 326 ई पू को झेलम नदी के पास हुआ था। जब सिकंदर(sikandar) झेलम नदी पर पहुंचा तब वहां पर पुरु अपनी सेना के साथ उसका झेलम नदी के पास इंतज़ार कर रहे थे। जहाँ सिकंदर की सेना मैं 50,000 पैदल सैनिक और 7,000 घुड़ सवार थे वहीँ पर पुरु की सेना मैं 20,000 पैदल सेनिक, 4,000 घुड़ सवार, 4,000 रथ और 130 से अधिक हाथी थे। जिसे देख  सिकंदर की सेना हाकपका गयी पर सिकंदर ने अपनी सेना मैं एक नया जोश जगा लिया।

 

पर इतना ही नहीं था झेलम नदी पर उफान इतना ज्यादा था कि उसे पार कर पाना बिलकुल संभव ही नहीं हो पा रहा था। इसपर सिकंदर(sikandar) कुछ सैनिक लेकर झेलम नदी  रास्ता देखने के लिए निकल जाता है। उसे वह रास्ता भी जल्दी ही मिल जाता है जिसे देख पुरु अपने बेटे को कुछ सैनिकों के साथ उससे वहां लड़ने भेज देता है। क्यूंकि वह जनता था की अगर वो यहाँ से हटा तो उसकी सेना पूरी की पूरी घुस आएगी। लेकिन सिकंदर से युद्ध करते समय पुरु का बीटा अपनी जान से हाथ धो बैठता है।

 

सिकंदर(sikandar) उस रास्ते से अपनी पूरी सेना के साथ नदी पार कर लेता है और युद्ध भूमि तक पहुँच जाता है। जहाँ पर पुरु की सेना पहले से ही तैयार होती है। सिकंदर घुसते ही पुरु की सेना पर आक्रमण बोल देता है और एक भीषड़ युद्ध छिड़  जाता है। शुरुआत से ही पुरु अपनी सेना के साथ युद्ध मैं बढ़त बनाने लगता है और सिकंदर की सेना पर पुरु की सेना भारी पड़ जाता है। पुरु की सेना के हाथी सिकंदर की सेना को कुचलने लगते हैं जिसे देख कर सिकंदर की सेना मैं भगदड़ मच जाती है।

 

सिकंदर और पुरु का आमना सामना 

 

हाथियों के प्रचंड रूप को देख कर के सिकंदर(sikandar) की सेना मैं भगदड़ मचने लगती है। सिकंदर अपनी हार होती देख खुद ही युद्ध भूमि मैं उतर पड़ता है और मुकाबला करने लगता है। वह पुरु के भाई पर जो की हाथी के ऊपर बैठा हुआ था उसपर हमला करता है पर पुरु का भाई उसपर भाले से हमला करता है इसी बीच सिकंद रकि तलवार उसके हाथ से छूट जाती है। और अचानक उसके सामने पुरु खड़ा हो जाता है। सिकंदर कुछ ही पल का मेहमान था की एक दम पुरु अपनी तलवार को हटा लेता है। इसी बीच सिकंदर के अंगरक्षक उसे अपनी ढाल पर हवा मैं उठा ले जाते हैं।

 

पुरु ने सिकंदर(sikandar) को इसलिए नहीं मारा था क्यूंकि किसी निहत्ते पर वार करना छत्रिय धर्म के विरुद्ध होता है। इससे हमें य भी मालुम होता है की पुरु छत्रिय धर्म का पालन करने वाला योद्धा था। युद्ध मैं सिकंदर की सेना को बहुत भारी मात्रा मैं नुक्सान हो रहा था। उसके कई सैनिक मारे गए थे और कई सैनिक घायल हो गए थे। पर सिकंदर ने अपनी सेना से कहा की हम विश्व विजेता बनने निकले हैं हम लड़ेंगे इससे उसकी सेना समझ गयी कि वह अपनी सेना के बारे मैं बिलकुल भी नहीं सोच रहा है। जिससे उसकी सेना मैं बगावत की स्तिथि उत्पन हो गयी।

 

इस बगावत की स्तिथि को सिकंदर समझ गया और उसे समझ मैं आ गया की उसने अगर युद्ध की हट नहीं छोड़ी तो उसकी सेना ही उसे मार देगी। उसने युद्ध विराम की घोसड़ा करते हुए पुरु के पास संधि करने का सन्देश भेज दिया। पुरु भी जानता था की सिकंदर मदद के लिए एक सेना और आने वाली है और आगे युद्ध करने का मतलब और नुक्सान झेलना होगा। और वह संधि के लिए मान जाता है।

 

पुरु और सिकंदर के बीच की संधि 

 

पुरु और सिकंदर(sikandar) के बीच की संधि की बहुत सी गलत कहानियां इतिहासकारों द्वारा गड़ी गयी हैं। दरअसल सिकंदर अपने साथ बहुत से इतिहासकारों को रखता था ताकि उसकी घटनाओं को वे लिख लिया करें।  वे लोग सिकंदर की चापलूसी के लिए मनगढंत और बड़ा चढ़ा कर उसकी बातें लिखा करते थे। तो उन्होंने ही लिख दिया कि सिकंदर युद्ध जीत गया था और पुरु की बहादुरी से खुश होकर उसने उसका राज्य लौटा दिया था। सिकंदर के बारे मैं बता दे कि उसने अपने गुरु के ही सेज भतीजे को मार डाला था क्यूंकि वह उससे युद्ध कला मैं निपुण होता जा रहा था। तो ऐसा व्यक्ति जो दुसरो को खुद से आगे देख उन्हें मार डालता हो वो किसी की बहादुरी से खुश कैसे हो सकता है। दरअसल सिकंदर तो सिर्फ युद्ध रोकने की कहने आया था और साड़ी शर्तें तो पुरु ने ही राखी थीं।

 

जब संधि के लिए दोनों पक्ष एक दूसरे के आमने सामने बैठे तो सिकंदर(sikandar) ने युद्ध को रोकने के के लिए कहा। पुरु ने सीधे तौर पर सिकंदर(sikandar) से कह दिया की वह वहां से लौट जाये।  यही वो शब्द थे जिनके ऊपर संधि तय हुई थी और इस संधि को सिकंदर ने मान लिया और वहा से सीधे सीधे लौट जाने का निर्णय ले लिया। क्यूंकि सिकंदर जान गया था कि अगर वह पुरु को नहीं हरा पाया तो मगध तो इससे भी बड़ा राज्य है वह कभी जीत नहीं सकता। तो यही सोच कर वह भारत को छोड़कर जाने का निर्णय ले लेता है।

 

सिकंदर(sikandar) की मृत्यु की वजह 

sikandar

 

सभी जानते हैं कि सिकंदर(sikandar) की मृत्यु भारत से लौट ते समय हुई थी। दरअसल इस युद्ध के बाद उसकी सेना बहुत ही थक चुकी थी और बहुत कमज़ोर पद गयी थी। सिकंदर भी इस युद्ध के बाद बहुत ही निराश और हताश होने के साथ साथ बहुत ज्यादा थक चूका था। जब वह लौट के जा रहा था तब उसका सामना बीच बीच मैं रास्ते के राज्यों से हो जाता था जिससे वह और कमज़ोर पड़ने लगा। उसे भारत के जाटों ने बहुत दौड़ाया और भगा भगा कर मारा। इस संघर्ष मैं और थकावट की वजह से ही सिकंदर(sikandar) और उसकी सेना ने दम तोड़ दिया। हम ये भी कह सकते हैं की भारत के जाटों ने सिकंदर की सेना से आक्रमण की अपेक्षा की गलत फेहमी से ही उसे मार दिया। और इसी तरह से उसका विश्व विजेता बनने का सपना अधूरा रह गया।

जो लोग सिकंदर(sikandar) को महान कहते है और ये भी कहते हैं की जो जीता वही सिकंदर(sikandar) वो एक बार दोबारा सोच ले। क्यूंकि सिकंदर से कहीं ज्यादा ज़मीं तो चंगेस खान ने जीती थी जो की एक मंगोल कबीले का सरदार था। ने दुनिया का 22 % हिस्सा जीत लिया था और हर युद्ध एक तरफ़ा जीता था। चंगेस खान कभी भी एक भी युद्ध नहीं हारा था।

 

 

 

 

 

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