PRITHVIRAJ CHAUHAN IN HINDI || PRITHVIRAJ CHAUHAN STORY, HISTORY, BIOGRAPHY IN HINDI

PRITHVIRAJ CHAUHAN IN HINDI || PRITHVIRAJ CHAUHAN STORY, HISTORY, BIOGRAPHY IN HINDI

 

पृथ्वीराज चौहान(prithviraj chauhan) राजपूत वंश का एक राजा रहे है जिसमे महाराण प्रताप, बाप्पा रावल जैसे शूरवीर जन्मे हैं। वह अखंड भारत पर राज  करने वाले आखिरी राजा हैं। उन्होंने अपना बचपन सिर्फ युद्ध विद्याओं को सिखने मैं लगाया था। उनके पास बहुत सी युद्ध कलाये थी जैसे शब्द भेदी बाण इस विद्या मैं पृथ्वीराज चौहान केवल किसी भी चीज़ या मनुष्य पर उसकी आवाज़ सुनकर उसपे निशाना लगा दिया करते थे। वे इस शब्द भेदी बाढ़ से बहुत दुरी तक निशाना लगा सकने मैं सक्षम थे। पृथ्वीराज चौहान के पुरे जीवन का चरित्र कवी चन्दरबरदाई ने अपनी किताब पृथ्वीराज रासो मैं किआ हैं। पृथ्वीराज रासो मैं पृथ्वीराज चौहान की हर घटना का ज़िक्र है।

 

पृथ्वीराज चौहान(prithviraj chauhan) अकेले ऐसे राजा हुए हैं जो द्वापर युग और कलयुग दोनों ही देख चुके हैं। वैसे तो पृथ्वीराज चौहान की उपलब्धियां बहुत हैं पर उनके कुछ ऐसे किस्से हैं जिन्हे हर कोई जानता तो है पर गलत तरीके से जनता है क्यूंकि इतिहास मैं बहुत छेड़ कहानी कर के हमारे भारतीय वीरों के इतिहास को दबाने का भरसक प्रयास किया गया है। जिसमे वे लोग बहुत हद तक सफल भी होते रहे हैं। पर दोस्तों मैं बिलकुल असली इतिहास और तथ्यों पर बात करता हूँ। पृथ्वीराज चौहान को हम तराइन मैं होने वाले युद्ध की वजह से ज्यादा याद किया करते हैं। हम सभी जानते हैं की पृथ्वीराज चौहान ने मोहम्मद गौरी को युद्ध मैं 17 बार हराया था। और हर बार वो पृथ्वीराज के सामने गिड़गिड़ा के माफ़ी मांगने लगता था। और पृथ्वीराज राज की तुलना अल्लाह से कर दिया करता था। और पृथ्वीराज को उसके धर्म की दुहाई दे देता थाऔर इसी वजह से पृथ्वीराज चौहान(prithviraj chauhan) उसे माफ़ भी कर देते थे।

 

आगे हम जानेंगे की किस तरह मोहम्मद गौरी ने पथ्वीराज चौहान को धोके से हराया तो चलिए आजका विषय शुरू करते हैं।

 

पृथ्वीराज चौहान(prithviraj chauhan) का शुरुआती जीवन

पृथ्वीराज चौहान(prithviraj chauhan) का जन्म भारत देश के शहर अजमेर, राजस्थान मैं चौहान वंश के राजपूतों मैं हुआ था। उनके पिता का नाम सोमेश्वर चौहान था और उनकी माता का नाम कारपुरी देवी था। वे राजपूत वंश मैं पैदा होने की वजह से शुरू से ही वीरता के किस्सों को सुनते हुए ए थे। जिस वजह से उन्हें शुरू से ही युद्ध कला सीखने का शौक चढ़ गया वे युद्ध कलाओं मैं इतने निपुण हो गए थे की पुरे भारत वर्ष मैं उनके नाम का डंका बोलने लगा। वे अपनी छोटी सी आयु मैं ही युद्ध विद्या सीखने के लिए बाहर तक जाने लगे। युद्ध कला के साथ साथ ही उन्हें धर्म के ग्रंथों और वेदों का भी अच्छा ज्ञान था। और वे हर युद्ध को धर्म के अनुसार ही करना पसंद करते थे। वे बहुत दयावान भी थे  उनसे माफ़ी मांगता था तो वे तुरंत ही उसपे दया दिखा देते थे।

 

वे जिस आश्रम मैं विद्या ग्रहण करने के लिए पहुंचे थे वहां के गुरु ने उन्हें बचपन मैं ही कह दिया था की तुम पुरे भारत वर्ष पर राज करोगे। और उन्हें कई विद्या सिखाई और उनके गुरु उन्हें अच्छी शिक्षा देने के लिए दूसरे आश्रम भी भेजा करते थे। जिससे वे हर युद्ध कला मैं निपुण हो गए थे पर उन्हें हर युद्ध को युद्ध नीति के अनुसार करना ही पसंद था। उन्हें कई विद्या आती थी जिसमे शब्द भेदी बाढ़ विद्या अहम थी।

 

आखिर क्या था शब्द भेदी बाढ़ विद्या 

prithviraj chauhan in hindi

 

यह एक ऐसी विद्या थी जिसे काफी प्राचीन काल मैं भारत के कुछ ही राजा जानते थे और ये वो राजा जानते थे जब सनातन धर्म के अलावा कोई और धर्म अस्तित्व मैं नहीं था। परन्तु पृथ्वीराज चौहान(prithviraj chauhan) को युद्ध कला सिखने का इतना शौक था की उन्हें इसके बारे मैं पता चला तो वे इसे सिखने के लिए व्याकुल हो उठे। तब उनकी उम्र बहुत ही काम थी तब उनके गुरु ने कहा की ये विद्या केवल एक जंगल के कबीलों को पता है। पर वे किसी को इसे नहीं सिखाते और उन तक पहुंचना भी बहुत ही कठिन है।

 

इस विद्या मैं आँख बंद करके केवल आवाज़ पर ही निशाना साधा जाता है और ये निशाना बारीक से बारीक आवाज़ को सुनकर लगाना होता है और निशाना एक बार मैं लगना चाहिए क्यूंकि दूसरा मौका न के बराबर ही मिलता है। और ये विद्या पृथ्वीराज चौहान के वक्त किसी भी और राजा को नहीं आती थी। और पृथ्वीराज चौहान इसी को सिखने की ज़िद पकड़ बैठे थे। आखिरकार पृथ्वीराज चौहान ने इस विद्या को सीख ही लिया और इस विद्या को सीख कर वे लगभग हर विद्या को सीख चुके थे। वे कद काठी मैं बहुत लम्बे चौड़े थे। वो जिस तलवार से लड़ा करते थे उसका वज़न 80 किलो था जिससे वे अपने दुश्मनो को बुरी तरीके से परास्त कर दिया करते थे। कहा जाता है की उनकी तलवार मैं इतना वजन  अपने दुश्मन को घोड़े समेत बीच से चीयर दिया करते थे। और उनके शब्द भेदी बाढ़ के उपयोग को आप आगे समझ जाएंगे।

 

पृथ्वीराज चौहान(prithviraj chauhan) का राज्य और उनका राज्य अभिषेक 

 

सोमेश्वर चौहान 1179 में एक युद्ध में निधन हो गया और पृथ्वीराज राजा के रूप में विराजमान हुए। उन्होंने  अजमेर और दिल्ली दो राजधानियों से शासन किया। राजा बनने पर उन्होंने अपने प्रदेशों का विस्तार करने के लिए कई अभियानों पर जोर दिया। उनके प्रारंभिक अभियान राजस्थान के छोटे राज्यों के खिलाफ थे, जिसने आसानी से जीत हासिल की थी। फिर उन्होंने खजुराहो और महोबा के चंदेलों के खिलाफ अभियान चलाया। वह चंदेल को पराजित करने में सफल रहे और इस अभियान से महत्वपूर्ण लूट हासिल करने में सफल रहे। 1182 में उन्होंने गुजरात के चौलाकियों पर हमला किया। युद्ध पर  कई वर्षों तक नाराजगी जताई और अंततः वह 1187 में चौलायक शासक भीमा द्वितीय द्वारा पराजित हो गये।

 

पृथ्वीराज चौहान(prithviraj chauhan) की सेना इन जीतों के बाद काफी शक्तिशाली हो चुकी थी हालाँकि  हारने का उन्हें कुछ ख़ास प्रभाव नहीं पड़ा। पृथ्वीराज अब पुरे भारत वर्ष मैं प्रसिद्धि हासिल कर चूके थे इतनी विशालकाय सेना के साथ कोई भी अब युद्ध नहीं करना चाहता था। क्यूंकि सब जानते थे की पृथ्वीराज चौहान से युद्ध का मतलब सिर्फ और सिर्फ हार ही होगी। अब पृथ्वीराज चौहान ने बुलंदी हासिल कर ली थी।

 

पृथ्वीराज चौहान का विवाह 

 

पृथ्वीराज चौहान का विवाह का किस्सा भी किसी फिल्म से काम नहीं है। उनका विवाह कन्नौज की राजकुमारी संयोगिता से हुआ था। जो की कन्नौज के राजा जय चन्द की बेटी थी। जय चन्द और पृथ्वीराज चौहान के बीच ज्यादा नहीं बनती थी इसलिए जय चन्द ने पृथ्वीराज को अपनी बेटी संयोगिता के स्वयम्बर मैं बुलाया ही नहीं।

 

संयोगिता जब यौवन को प्राप्त हुई, उस समय सम्पूर्ण भारत में पृथ्वीराज की वीरता की चर्चाएँ हो रही थी। संयोगिता ने जब पृथ्वीराज(prithviraj chauhan) की वीरता की कथा सुनी, तब वह पृथ्वीराज के प्रेम पाश में बंध गई। प्रेमशास्त्र में एसी कन्याओं को मुग्धा कहा गया है। मुग्ध संयोगिता के हृदयस्थ प्रेम के विषय में जब जयचन्द को संज्ञान हुआ, तो उसने अन्य राजा के साथ अपनी पुत्री का विवाह करने के लिये उद्यत हुआ। क्योंकि जयचन्द और पृथ्वीराज के मध्य सम्बन्ध वैमनस्यपूर्ण थे। उसके बाद जयचन्द ने अश्वमेधयज्ञ का आयोजन किया। उस यज्ञ के अन्त में संयोगिता के स्वयंवर की भी घोषणा कर दी। स्वयंवर के अवसर पर उसने सम्पूर्ण भारत के सभी राजाओं को निमन्त्रण दिया परन्तु पृथ्वीराज को निमन्त्रण नहीं दिया। पृथ्वीराज की इस प्रकार अपमान करने पर भी जयचन्द सन्तुष्ट नहीं हुआ। अतः उसने लोहे से पृथ्वीराज की मूर्ति बनवा कर द्वारपाल के स्थान पर प्रस्थापित कर दी। परन्तु स्वयंवर के समय संयोगिता ने पृथ्वीराज की मूर्ति को ही वरमाला पहनाई। द्वार पर स्थित संयोगिता जब पृथ्वीराज की मूर्ति को वरमाला पहना रही थी, उसी समय पृथ्वीराज ने प्रासाद (महल) में प्रवेश किया। पृथ्वीराज ने संयोगिता को अश्व (घोड़े) के उपर बिठाया और देहली (दिल्ली) चले गये।

 

इस कृत्य से जय चन्द आग बबूला हो उठा और पृथ्वीराज चौहान से बदला लेने के लिए आतुर हो गया। उसे इस तरह से पृथ्वीराज  संयोगिता को लेकर चले जाना अपना बहुत बड़ा अपमान लगा और वो दिन रात प्रतिशोध की ज्वाला मैं जलने लगा और पृथ्वीराज चौहान से बदला लेने का मौका देख रहा था।

 

पृथ्वीराज चौहान(prithviraj chauhan) और मोहम्मद गौरी का युद्ध 

prithviraj chauhan in hindi

वैसे तो यह एक बड़ा विवाद है की महोम्मद गौरी और पृथ्वीराज चौहान के बीच कितने युद्ध हुए है। पर भारतीय इतिहास मैं कहा गया है की इन दोनों के बीच 18 युद्ध हुए जिसमे की पृथ्वीराज चौहान 17 बार जीते और मोहम्मद गौरी 1 बार जीता। पहले 17  के हर बार पृथ्वीराज चौहान ने मोहम्मद गौरी को माफ़ कर दिया पर 1 बार ही युद्ध जीतने वाला मोहम्मद गौरी पृथ्वीराज को कभी माफ़ न कर सका। लेकिन ये बात भी सत्य है की दरअसल मोहम्मद गौरी ने युद्ध जीता ही नहीं था उसने धोके से पृथ्वीराज(prithviraj chauhan) को घेर लिया और बंदी बना कर के ले गया।

 

मोहम्मद गौरी एक के बाद एक करके 17 युद्ध हार गया पर हर युद्ध के बाद वो पृथ्वीराज चौहान से माफ़ी मांग लेता था।  वो कहता था की अगर पृथ्वी उसे माफ़ कर देता है तो वो समझेगा की अल्लाह का दीदार उसे पृथ्वीराज के रूप मैं हुआ क्यूंकि अल्लाह हर गलती को माफ़ कर देता है। वहीँ मोहम्मद गौरी दोबारा से पृथ्वीराज चौहान पर आक्रमण करता है इस बार वह इस बार बहुत बड़ी सेना एकत्रित करता है और युद्ध भूमि पहुँच जाता यही इस बार उसकी मदद कन्नौज का राजा जय चाँद कर देता है क्यूंकि वह भी पृथ्वीराज चौहान से चिड़ा हुआ था और बदला लेना चाह रहा था।

 

जय चंद गौरी को बताता है की इस तरह से तुम पृथ्वीराज चौहान को कभी भी नहीं हरा पाओगे और जीवन ही तुम्हारा  मैं निकल जाएगा और हमेशा ही मुँह की कहते रहोगे। मोहम्मद गौरी कहता है की आप बता दे की किस तरह युद्ध जीता जा सकेगा क्यूंकि मैं नियम को भी टाक पर रख सकता हूँ पर इस बार हार का मुँह नहीं देखूंगा। तो ऐसा कहा जाता है की जय चंद ने मोहम्मद गौरी से कहा की पृथ्वीराज और उसकी सेना सुबह की आरती के वक्त अपने साथ हथियार नहीं ले जाती तो उसी समय वो पृथ्वीराज को पकड़ सकता है।

 

तो वैसा ही हुआ मोहम्मद गौरी ने अपनी सेना की 5 टुकड़िआ तैयार करि और अलग अलग दिशा मैं फैला दिया। जैसे ही पृथ्वीराज चौहान सुबह की आरती के लिए गए तो अचानक से मोहम्मद गौरी ने हमला कर दिया यह देख आनन् फानन मैं सेना हथियार लेने के लिए भागी पर मोहम्मद गौरी ने उन्हें हर तरफ से घेर लिया और हथियार न होने के कारण पृथ्वीराज की सेना मारी गयी और पृथ्वीराज को घेर लियाऔर कैद कर लिया। पृथ्वीराज को वहां से अरब ले जाया गया पर वो वीर वहां भी नहीं झुका और कहा की मैंने 17 बार तुम्हे माफ़ी की भीक दी है तुम मुझे क्या दे सकते हो…..कुछ नहीं दे सकते गौरी मैं राजपूत हूँ माफ़ी पर नहीं जीता।

 

इतिहास मैं केवल दो ही युद्ध का ज़िक्र है 

 

साल 1191 में थानेश्वर के पास तराइन के मैदान में पृथ्वीराज और मोहम्मद गौरी के बीच पहला युद्ध हुआ, जिसमें, मोहम्मद गौरी को हार का सामना करना पड़ा। इस युद्ध में पृथ्वीराज चौहान द्धारा मोहम्मद गौरी को बंधक बना लिया गया, हालांकि पृथ्वीराज चौहान ने बाद में उसे छोड़ दिया। गोरी और पृथ्वीराज चौहान के बीच हुआ यह युद्ध तराइन का प्रथम युद्द के नाम से मशहूर है।

 

प्रथम युद्ध में पृथ्वीराज चौहान से पराजित होने के बाद मोहम्मद गौरी ने अपनी और अधिक शक्ति और साहस के साथ पृथ्वीराज चौहान पर साल 1192 में तराइन के मैदान में ही आक्रमण कर दिया और इस युद्ध में मोहम्मद गौरी के पराक्रम के सामने महान योद्दा पृथ्वीराज चौहान का साहस भी कमजोर पड़ गया और वे इस युद्ध में हार गए। इस तरह मोहम्मद गोरी ने चौहान साम्राज्य का नाश कर दिल्ली और अजमेर पर जीत हासिल कर ली। वहीं तराइन के इस दूसरे युद्ध में पृथ्वीराज चौहान के सबसे भरोसेमंद सामंत और दिल्ली के तोमर शासक गोविंदराज की मौत हो गई। इस युद्ध में हारने के बाद पृथ्वीराज चौहान और मोहम्मद गौरी की मौत भी हो गई, हालांकि मोहम्मद गौरी और पृथ्वीराज चौहान की मौत के बारे में इतिहासकारों के अलग-अलग मत हैं।

 

क्या वास्तव मैं मोईनुद्दीन चिश्ती को पृथ्वीराज चौहान की बेटियों ने मारा था ?

 

कई इतिहास मै रूचि रखने वाले लोग इस युद्ध मैं मोईनुद्दीन चिश्ती का भी ज़िक्र करते हैं और कहते हैं की जब मोहम्मद गौरी ने पृथ्वीराज चौहान को बंदी बनाया तब  मोईनुद्दीन चिश्ती भी थे। ये वही मोईनुद्दीन चिश्ती हैं जिनकी दरगाह अजमेर मैं अजमेर शरीफ के नाम से मशहूर है। कहते है की मोहम्मद गौरी ने पृथ्वीराज चौहान से इस्लाम कबूल करने को कहा तो पृथ्वीराज चौहान ने मना कर दिया। इसके बाद गौरी ने पृथ्वीराज की पत्नी संयोगिता से इस्लाम कबूलने को कह तो संयोगिता ने कहा की जब मेरे राजन मना कर रहे है तो मैं कैसे कर लूँ। तो उन लोगों ने संयोगिता को निर्वस्त्र करके अपनी सेना मैं फेक दिया था। इस कृत्य को सुनकर पृथ्वीराज चौहान की बेटियों ने मोईनुद्दीन चिश्ती को अपने हाथ से तलवारों के प्रहार से काट दिया था। पर इसका बात का कोई पुख्ता सबूत नहीं है।

 

पृथ्वीराज चौहान(prithviraj chauhan) की मृत्यु 

prithviraj chauhan in hindi

 

पृथ्वीराज चौहान की मृत्यु को लेकर अलग अलग मत हैं। लेकिन जो ज्यादा प्रचलित है पहले उस पबाट कर लेते हैं।

 

मोहम्मद गौरी पृथ्वीराज चौहान(prithviraj chauhan) को बंदी बनाकर उसे अपने साथ अरब मैं गजिनी ले गया उसे वहां बहुत सी यातनाए दी गयीं पृथ्वीराज के साथ वहां उनके कवी चन्दरबरदोई भी गए थे। यातना इतनी दी गयीं की पृथ्वीराज की आँख तक को फोड़ कर उनमे मिर्च डाली जाती थी पर फिर भी पृथ्वीराज उनके सामने झुकने को तैयार नहीं थे। वो कहते थे की राजपूत हूँ और राजपूत अड़ गया तो अड़ गया और कह गया तो समझो कर गया। एक बार गजिनी मैं उसी समय एक आयोजन हुआ तो कवी चन्दरबरदोई ने गौरी से कहा की मेरे राजा को अपनी विद्या शब्द भेदी बाढ़ का एक नमूना दिखने का मौका दिया जाये। पर गौरी इसपर राजी नहीं हुआ तो चन्दरबरदोई ने कहा की या तो हमें मार दो या मौका दो इस बात पर गौरी मान गया। जब उन्होंने तीर कमान उठाए तो चन्दरबरदोई ने पृथ्वी से कहा की मेरे पास दो कतार हैं एक आपके लिए एक मेरे लिए मैं कविता पद कर सुनाऊंगा उस हिसाब से वार करना गौरी मर जाएगा। और कतार से हम दोनों आत्म ह्त्या कर लेंगे।

चार बांस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण
ता उपर सुल्तान है,मत चूको चौहान।।

 

पृथ्वीराज ने वार किआ जो सीधा मोहम्मद गौरी के गर्दन मैं जाकर सर के पार हो गया और पृथ्वीराज और चन्दरबरदोई ने भी आत्मा हत्या कर ली।

 

इतिहासकारों  मत हैं

 

तराइन के दूसरे युद्द में हारने के बाद पृथ्वीराज चौहान ने अपनी अधीनता स्वीकार कर ली और गौरी ने उसे अजमेर में अपने अधीन रखकर शासन करवाया। और फिर पृथ्वीराज को मरवा दिया और उसकी कब्र को अफगानिस्तान में गढ़वा दिया।

फिलहाल, इसके बाद मोहम्मद गौरी और कन्नौज के राज् जयचंद जिसने पृथ्वीराज के खिलाफ युद्ध में साथ दिया था, दोनों के बीच युद्ध हुआ। मोहम्मद गौरी ने जयचंद की धोखेबाजी से गुस्साकर उस पर आक्रमण कर दिया। उन दोनों के बीच हुए युद्ध को “चंद्रवार” कहा गया। युद्ध जीतने के बाद गौरी अपने अपने राज्य गजनी वापस लौट गया था, हालांकि इससे पहले उसने अपने एक काबिल गुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक को दिल्ली का सुल्तान बना दिया था।

वहीं कुछ इतिहासकारों के मुताबिक साल 1206 ईसवी में मोहम्मद गौरी की मौत के बाद भारत में कुतुबुद्दीन ऐबक ने एक नए गुलाम वंश की नींव डाली। जिसकी नींव पर दिल्ली सल्तनत और खिलजी, मुगल, लोदी, तुगलक,सैय्यद, आदि राजवंशों की आधारशिला रखी गई थी।

हालांकि, गुलाम वंश के शासकों ने तो 1206 से 1290 तक ही शासन किया, लेकिन उनके शासन की नींव पर ही दिल्ली के तख्‍त पर अन्य विदेशी मुस्लिमों ने कई सालों तक राज किया, जो कि करीब 1707 ईसवी तक ओरंगजेब की मृत्यु तक चला। वहीं मोहम्मद गौरी ने अपने राज में विशेष प्रकार के सिक्के भी चलाए थे, जिनके एक तरफ कलमा खुदा रहता था, जबकि दूसरी तरफ लक्ष्मी की आकृति बनी हुई थी।

 

पृथ्वीराज चौहान की कब्र पर अरब मैं आज भी जुटे मारते हैं मलेछ 

 

पृथ्वीराज चौहान एक साहसी राजपूत और एक बहुत ही निडर मानव था उन्होंने 17 बार मोहम्मद गोरी को हराया था i परन्तु मोहम्मद गोरी ने पृथ्वीराज चौहान को धोके से पकड़ लिया था और अपने देश ले गया था। जहां पर सम्राटपृथ्वीराज चौहान को अमानवीय ढंग से मारा गया। सम्राट पृथ्वीराज चौहान को मोहम्मद गोरी की कब्र के पास दफनाया गया था। अब यह अफगानिस्तान में परंपरा है कि जो लोग मोहम्मद गोरी की कब्र पर इबादत के लिए जाते है वो पहले भारत के सम्राट पृथ्वीराज चौहान के शव को जहां दफनाया था उस जगह का अनादर करते है पृथ्वीराज को गालिया देते है। 

 

वहां पर अपनी चप्पले रखते है। कब्र पर शिलालेख में लिखा है: “यहाँ दिल्ली के काफिर राजा पृथ्वीराज चौहान की कबर है। भारत सरकर ने करोड़ो रुपए अफगानिस्तान के पुन निर्माण मे दिया थे i ।हम हिन्दू भारत सरकार से विनती करते है कि भारत के महान सम्राट कि असथीया भारत लाकर पुरे मान समान के साथ अंतिम संसकर करे ।जय भारत माता की।जय भारत के वीर सपूतो की ।

 

पृथ्वीराज चौहान(prithviraj chauhan)  से जुड़े कुछ तथ्य 

 

  • पृथ्वीराज चौहान अकेले ऐसे राजा हुए हैं जो द्वापर युग और कलयुग दोनों ही देख चुके हैं।
  • पृथ्वीराज चौहान का जन्म भारत देश के शहर अजमेर, राजस्थान मैं चौहान वंश के राजपूतों मैं हुआ था। उनके पिता का नाम सोमेश्वर चौहान था और उनकी माता का नाम कारपुरी देवी था।
  • उन्हें कई विद्या आती थी जिसमे शब्द भेदी बाढ़ विद्या अहम थी।
  • सोमेश्वर चौहान 1179 में एक युद्ध में निधन हो गया और पृथ्वीराज राजा के रूप में विराजमान हुए। उन्होंने  अजमेर और दिल्ली दो राजधानियों से शासन किया। राजा बनने पर उन्होंने अपने प्रदेशों का विस्तार करने के लिए कई अभियानों पर जोर दिया।
  • उनका विवाह कन्नौज की राजकुमारी संयोगिता से हुआ था। जो की कन्नौज के राजा जय चन्द की बेटी थी।
  • भारतीय इतिहास मैं कहा गया है की इन दोनों के बीच 18 युद्ध हुए जिसमे की पृथ्वीराज चौहान 17 बार जीते और मोहम्मद गौरी 1 बार जीता।
  • साल 1191 में थानेश्वर के पास तराइन के मैदान में पृथ्वीराज और मोहम्मद गौरी के बीच पहला युद्ध हुआ, जिसमें, मोहम्मद गौरी को हार का सामना करना पड़ा।
  • कई इतिहास मै रूचि रखने वाले लोग इस युद्ध मैं मोईनुद्दीन चिश्ती का भी ज़िक्र करते हैं और कहते हैं की जब मोहम्मद गौरी ने पृथ्वीराज चौहान को बंदी बनाया तब  मोईनुद्दीन चिश्ती भी थे।
  • चार बांस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण
    ता उपर सुल्तान है,मत चूको चौहान।।
    यह कविता सुनकर पृथ्वीराज ने शब्द भेदी बाढ़ से मोहम्मद गौरी पर वार किया  जो सीधा मोहम्मद गौरी के गर्दन मैं जाकर सर के पार हो गया और पृथ्वीराज और चन्दरबरदोई ने भी आत्मा हत्या कर ली।

 

 

 

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